सूर्यदेव

सूर्यदेव

 

                                                             

                       || सूर्याय नमः||

ज्ञानकोश विकिपीडिया शास्त्रों के अनुसार -

कश्यप (पिता),अदिति (माँ),संजना, छाया(पत्नी) श्रद्धादेव मनु, यम, अश्विन, रेवंत, शनि और सावर्णी मनु (पुत्र),यामी और तापती (बेटियाँ),कर्ण और सुग्रीव (आध्यात्मिक पुत्र)

सूर्यदेव को वेदों-पुराणों-शास्त्रों के अनुसार जगत की आत्मा कहा गया है | पूरे ब्रह्माण्ड के सजीवों की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस मृत्युलोक में  जीवन है, यह आज एक अटल सच है।  सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक.यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी है। ऋग्वेद के देवताओं में सूर्यदेव का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद के अनुसार "चक्षो सूर्यो जायत" कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। छान्दोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है और उन्हीं  को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते हैं । सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नहीं कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी। बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र तत्र सूर्य मन्दिरों का निर्माण हुआ।

भविष्य पुराण में ब्रह्मा विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा एवं मन्दिर निर्माण का महत्व समझाया गया है। अनेक पुराणों में यह लिखित पाया जाता है  कि ऋषि दुर्वासा के शाप से श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने  कुष्ठ रोग से ग्रस्त होकर  सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पायी थी।  वैदिक साहित्य में ही नहीं आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व दिया  गया है।

                                                                                                                    बालार्क सूर्य मंदिर में स्थापित बालरूपभगवान सूर्य देव की प्रतिमा का छायाचित्र   

बालार्क सूर्य मंदिर में भगवान सूर्य के बाल रूप का दर्शन होता है, जिसकी प्रतिमा का छायाचित्र मै ऊपर दिया हूँ। यह प्रतिमा श्वेत रंग के संगमरमर से बनायी गयी है, जिसमे  भगवान सूर्य अपने एक चक्के और सप्तमुख घोड़े से युक्त चक्रपाद / रथ पर सवार हैं  । इसमें  उनके सारथी अरुण भी मौजूद हैं ।(मूर्ति तो बहुत समय पहले स्थापित की गयी है जिसका प्रत्यक्ष  प्रमाण तो नहीं मिला परन्तु शिल्पकला और  बनावट के आधार पर  ऐसा प्रतीत होता है कि  मूर्ति काफी पुरानी है, पुरानी और ज्यादा दिनों की होने के कारण मूर्ति के रंग रूप में काफी बदलाव देखने को मिलता है )

विष्णुपुराण के द्वितीय अंश के आठवे अध्याय से दशवें अध्याय तक, बारह महीनो के आधार पर सूर्य के बारह नामों का अर्थ बताया गया है , जो निम्न है -  

महीना          नाम
चैत्र        धाता
बैशाख अर्थमा
ज्येष्ठ मित्र
आषाढ़ वरुण
श्रावण इन्द्र
भाद्रपद विवस्वान
आश्विन पूषा
कार्तिक  पर्जन्य
मार्गशीर्ष  अंशु
पौष  भग
माघ त्वस्ता
फाल्गुन विष्णु

       

भगवान् सूर्य के महीने के आधार पर नामों का बैज्ञानिक महत्त्व -

१. चैत्र मास का नाम है धाता, धाता का मतलब होता है निर्माता,संग्राहक,समर्थक,प्राण इस आधार पर भगवान् विष्णु और ब्रह्मा को उक्त सभी नामो की विशेषताएं भगवान् सूर्य में सनिहित हैं।  वे निर्माता हैं,रसों के संग्राहक भी हैं,आक्सीजन के आधिष्ठवान होने के कारण प्राणभूत भी हैं,और धान्य/अनाज में रसोत्पादक होने के कारण समर्थक तथा प्राणरक्षक भी है। 

२.  बैशाख महीने में ये अरदमा के नाम से जाने जाते हैं, अरदमा का अर्थ पितृश्रेष्ठ को पितृणामरयमा चास्मि (गीता-१०१२९) अर्क (आक) के पौधें को जिस प्रकार पितृगण अपनड़े वंशजों के उपकार में सन्नद्ध रहते है, उसी प्रकार सूर्य भी अर्क वृक्ष की भाँती हरे भरे रहने की प्रेरणा देते हैं।

३. ज्येष्ठ के महीने में सूर्य को मित्र कहा जाता है , वरुण के सहयोगी आदित्य को राजा के पडोसी तथा सुहृद को सूर्य वर्षा ऋतू के पडोसी और मित्र है अर्थात आषाढ़ मास में वर्षा होने से पहले अपने प्रभाव से धरती को तपा करके वर्षा आगमन की पृष्ठ भूमि तैयार करके एक सुहृद की भाँती भूमण्डल का हित साधन करते हुए वरुण के सहयोगी आदित्य तथा मित्र दोनों नामो को सार्थक करते है।

४. आषाढ़ में सूर्य वरुण,अर्थात वरुण को जल का स्वामी माना जाता है ( भगवद गीता  में  १०१२९ ) भगवान् श्री कृष्ण अपना स्वरुप बतलाते हुए कहते है कि "वरुणों यादसामहं" इसके अलावा समुद्र को वरुण कहते है।  सूर्य समुद्री जल का आकर्षण कर के वरुण रूप में इसी महीने में उस जल को हितार्थ लौटाकर अपने नाम को सार्थक करते है। 

५. श्रावण मास में सूर्य इन्द्र, अर्थात इन्द्र कहते है देवाधीय यानी वर्षाधिय वर्षा का शाशक सर्वोत्कृष्ट को इस महीने में सूर्य इन्द्र रूप में मेघों का नियंत्रण कर आवश्यकतानुसार वर्षण द्वारा पृथ्वी को आप्लावित / डूबा कर अपनी सर्वोत्कृष्टता तथा शाशन पटुता कि अमिट छाप जान मन पर छोड़ते हैं , अतः यह कितना सार्थक है इसे सहज ही जाना जा सकता है।

६. भाद्रपद में सूर्य विवस्वान, कहते है कि वर्तमान मनु अर्क वृक्ष तथा अरुण आदि को भाद्रपद कि उष्मा कितनी उग्र होती है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है अनेक लोग इससे व्यथित हो सन्यासी कि तरह घर त्याग देते है। सूर्य ब्रह्मा कि भांति इस समय धरा पर तेजस्विता कि छाप अंकित करने लगते है। 

७. आश्विन में पूषा के रूप में रहते है, जिसका भावार्थ होता है पोषक तथा गणक क्योकि इस मास का सूर्य धान्य का पोषण भी करते है और आकाश में उन्मुक्त होकर सहविचरण भी यह नाम सार्थक है।  

८. कार्तिक में पर्जन्य, ये कहते है कि गरजने अथवा बरसने वाला मेघ को (रामचरित मानस से) "कहु कहु कृष्टि सारदी थोरी" इस काल में सूर्य पर्जन्य मेघ के रूप में सृष्टि कि आत्मा को परितोष देते हुए अपना नाम सार्थक करते है और इन्द्र रूप में सूखी सर्दी को आद्रता से सिंचित करके नियंत्रित करते है।  

९. मार्गशीर्ष (अगहन) मास में यह अंशु के रूप में रहते है, अंशु का अर्थ है रश्मि उष्मा,अपनी उष्म रश्मियों से मार्गशीर्ष के प्रखर शील को अपसारित करने की क्षमता से संपन्न सूर्य का यह नाम भी सार्थक होता है। 

१०. पौष में यह भग, जिसका अर्थ है सूर्य , चन्द्रमा , शिव , सौभाग्य , प्रसन्नता , यश , प्रेम , सौंदर्य , गुण, धर्म ,प्रयत्न तथा शक्ति पौष मास में अत्यंत  ठण्ड से अपने को चंद्र की भांति शैल्य बढ़ाकर , शिव की तरह कल्याण कर प्रकृति स्वर्गीय सुषमा की सृस्टि कर जनमानस को गर्मी प्रदान कर शीत से मोक्ष देकर अपने नाम को सार्थक बनाते है। 

११. माघ के सूर्य का नाम है तवस्ता, जिसका अर्थ निर्माता,बढ़ई, विश्वकर्मा (देवशिल्पी)। ये नाम भी सार्थक है क्युकी इस महीने में सूर्य प्रकृति के ज़रा जर्जरित उपादानों के कुशल शिल्पी की भांति तराश कर अभिनव रूप प्रदान करते है। 

१२. फाल्गुन मास में सूर्य विष्णु के रूप में रहते है, पराशर जी के रचना के अनुसार विष्णु का अर्थ है रक्षक यह सम्पूर्ण विश्व उन परमात्मा की ही शक्ति से व्याप्त है अतः वह विष्णु कहलाते है। क्युकी विष धातु का अर्थ प्रवेश करना है इस महीने में सूर्य शक्ति संपन्न होकर शक्ति संचार करने में समर्थ हो जाते है। 

सूर्य पूजा व भगवान् सूर्य की विश्व मान्यता / महत्व -: 

                                                                   

दैनिक भास्कर हिंदी न्यूज़  १३-११-२०२८ छठ पूजा के दिन के प्रकाशित लेख के अनुसार  -

भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में सूर्य की पूजा का अलग-अलग महत्व है।मानव सभ्यता का इतिहास साक्षी है कि दुनिया का कोई कोना नहीं है, जहां सूर्य को पूजा न गया हो। मित्तनी, हित्ती, मिस्र के राजाओं के लिए सूर्यपूजा का सामान्य स्रोत भारत ही था। ऋग्वेद की ऋचाओं में सूर्य के विषय में जो कुछ दर्ज है, दूसरी सभ्यताओं में भी कुछ वैसा ही है। अंतर है तो नाम का। सूर्य के लिए लैटिन में ‘ सो ‘, ग्रीस में ‘हेलियोस’, मिस्र में ‘रा’ व ‘होरुस’ कहा गया है। सिकंदर के अभियानों के बाद सीरिया में सूर्य पूजा पनपी। पड़ोस में ईरानी साम्राज्य था। मित्र (सूर्य) की उपासना ईरान से रोम तक पहुंची। अनेक रोमन शासक मिथ्रादतेस नाम धारण करते थे। मित्र की पूजा के लिए मंदिर बनाए गये थे। मिस्र में राजा देवता के प्रत्यक्ष रूप माने जाते थे। सूर्य देवता ‘ रे ‘को अनेक स्थानों पर सृष्टिकर्ता माना गया है।

भारत:-

                                   सूर्य की उपासना ऋग्वैदिक युग से ही होती रही है, जिनका ऋग्वैदिक नाम ‘सविता’ भी है। ऋग्वैदिक काल में वे जगत के चराचर जीवों की आत्मा हैं। वे सात घोड़े के रथ पर सवार रहते हैं और जगत को प्रकाशित करते हैं। वे प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ रूप हैं। कालांतर में देशभर में उनकी पूजा प्रारंभ हुई। कुषाण काल में सूर्य की मूर्तियां भी बननी शुरू हो गईं। ऐसी एक मूर्ति मथुरा के संग्रहालय में है, जिसकी बनावट और साज-सज्जा पूर्णत: मध्य-एशियाई है। कालिदास ने ‘रघुवंशम’ में सूर्य की उपस्थापन का वर्णन किया है। उन्होंने सूर्य के सात अश्वों का उल्लेख किया है। गुप्त सम्राट कुमार गुप्त के शासनकाल में रेशम बुनकरों के संघ ने मंदसौर के निकट दशपुर में एक सूर्यमंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। तत्कालीन युग की सूर्य की अनेक मूर्तियां मिली हैं, जो मथुरा संग्रहालय में हैं। हूण शासक तोरमाण और मिहिरकुल सूर्य की पूजा करते थे। थानेश्वर के राज्यवर्धन, आदित्यवर्धन, प्रभाकरवर्धन जैसे शासक सूर्योपासक थे। अभिलेखों में मुल्तान के जिस सूर्य मंदिर का उल्लेख किया गया है। उसके विषय में अलबीरूनी का कहना है, “सूर्य की वो सबसे प्रसिद्ध मूर्ति थी, जो आदित्य कहलाती थी। वह लकड़ी की थी और लाल चमड़े से ढंकी थीं। कहा जाता है वो कृतयुग में बनी थी।’ मुल्तान के सूर्य मंदिर का विवरण स्कन्दपुराण में भी मिलता है। 13वीं सदी में निर्मित उड़ीसा का कोर्णाक सूर्य मंदिर अत्यंत भव्य और विशाल है। ऐतिहासिक रूप में सूर्य उपासक समुदाय के अनुयायी मस्तक पर लाल चंदन की सूर्य आकृति बनाते हैं और लाल पुष्पों की माला पहनते हैं।

अमेरिका:-

                            तोनातिहू, वह जिसकी काया से प्रकाश बिखर रहा है और जो सभी आजटेक लोगों (मध्य अमेरीकी देशों के मूल वाशिंदे) का रखवाला है, वो मध्य अमेरिका के लोगों के सूर्य हैं। वो फसलों को खुशहाली देते हैं और इंसानों को जीवन। अमेरीकी गाथाओं में वर्णन है कि दुनिया में कई युगों तक अंधकार छाया था, इसपर जीवन संभव नहीं था और सूर्य स्वर्ग में निवास कर रहे थे, तब आजटेक लोगों ने अपने प्राणों की बलि देकर सूर्यदेव को प्रसन्न किया, उसके बाद सूर्य ब्रह्मांड में अवतरित हुए। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह सूर्य का पांचवां रूप है और इससे पूर्व चार युगों में चार सूर्य आए और खत्म हुए। इस तरह धरती का भी संहार हो गया। वैज्ञानिक रूप से यह समुदाय सूर्य अथवा तारों की उत्पत्ति और विनाश की बात करता है।

यूनान:-

                          यूनानी धर्म में सूर्य पूजा का अत्यधिक महत्व है। प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “रिपब्लिक’ में सूर्य पूजा की महिमा का वर्णन किया है। सूर्यदेव को यहां सांकेतिक रूप में हेलियोस के नाम से जाना जाता है। वह टाइटन हाइपेरियोन और हूसियोड के पुत्र हैं। वो घोड़े के द्वारा खींचे जा रहे रथ पर सवार होकर लोगों को उन्नति प्रदान करने निकलते हैं। हेलियोस के घोड़े आग के समान ज्वाला लेकर आगे बढ़ रहे हैं जो डर का कारण हैं। राेमन गाथाओं में हेलियोस के समतुल्य भगवान सोल हैं। ये भी सूर्य के ही सूचक हैं। यूनानी मान्यताओं में कहा गया कि एक बार हेलियोस का रथ उनका बेटा फेथॉन लेकर निकल पड़ा तो उसने अपना संतुलन खो दिया और पूरी धरती पर आग लग गई, तब अंतरिक्ष के देवता जियोस ने तत्काल वज्रपात कर फेथॉन को मारा और धरती पर जीवन को नष्ट हाेने से बचा लिया।

जापान :-

                        स्वर्ग से चमक बिखेर रही अमतेरासू-ओमिकानी, जापानी गाथाओं में सूर्य माता हैं। वो संपूर्ण ब्रह्मांड की भी देवी हैं। जापान के होनशू द्वीप पर इनके मंदिर हैं। भारत में लगने वाले महाकुंभ की तरह इनकी अराधना में भी प्रत्येक 20 सालों पर सिखिन सेंगू जैसे मेले लगते हैं और पूजा की जाती है जिसमें पूर्व मंदिर स्थल से सटे ही एक अन्य मंदिर का निर्माण किया जाता है। इस तरह इन मंदिरों में अमतेरासू (सूर्य) के अन्य रूप जिंगू, इस्ले-जिंगू आदि की स्थापना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं में जापान के सम्राट को सूर्य का वाहक माना जाता है और प्रजा की उनमें अपार श्रद्धा है।

इरान:-

                      ई.पू. 200-300 के बीच ईरानी लोगों के सूर्यदेव ‘मित्र’ के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। ये वहीं ‘मित्र’ हैं जिनकी जानकारी रोमन धर्मशास्त्राें में इसी के समकालीन सूर्य के एक सहयोगी देवता के रूप में मिलती है। मित्रदेव की छाया वहां के सम्राट पर भी पड़ती थी इसलिए उन्हें भी पवित्र माना जाने लगा। भारतीय गाथाओं और वैदिक साहित्य में ‘मित्र’ को सूर्य के सहयोगी देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। ग्रीक और रोमन लोग भी मित्रदेव को सूर्य का ही प्रतीक मानते हैं। एेसा माना जाता है कि ‘मित्र’ की उत्पत्ति ब्रह्मांड में स्वयं ही एक गुफा के भीतर 25 दिसंबर को हुई और उनपर किसी का वश नहीं चलता।

मिस्र :-

                      मिस्र में उगते सूर्य होरूस, दोपहर के सूर्य रा, जो सबसे महत्वपूर्ण हैं। अस्त होते सूर्य के रूप में वह ओसिरिस कहलाते हैं। हालांकि मिस्री फराओ अमेनहोटेप चतुर्थ ने इन सभी सूर्य को खत्म कर नए सूर्य अटेन की पूजा करने को लोगों से कहा। हालांकि उसकी मृत्यु के बाद उसके दामाद तुतनखाटेन ने पुरानी परंपरा का अनुसरण करते हुए सूर्य रा की पूजा को प्राथमिकता दी। कुछ समय बाद होरूस सूर्य का रा सूर्य के साथ मिलन हो गया। हालांकि बाद में यहां एक अन्य सूर्य आमुन का भी प्रादुर्भाव हुआ लेकिन इनका भी एकात्म रा सूर्य में हो गया। मिस्र के लोगों के अनुसार दुनिया पर रा का ही राज है और यह बाज का सिर लिए पूरी दुनिया की चौकसी और इंसान का असुरों से संरक्षण कर रहे हैं।

रोम :-

                      यूनानी गाथाओं में अपोलो को ईश्वर के समकक्ष तो दर्जा दिया गया लेकिन सूर्य के रथ के साथ वो दृष्टिगोचर नहीं हुए। दूसरी ओर रोमन लोगों ने अपालो की तुलना सूर्य से की और उनकी पूजा सूर्य रूप में ही की जाने लगी। यहां वो अश्वों के द्वारा खींचे जाने वाले गाड़ी में दिखे। इन्हें अन्य नाम “सोल’ से भी जाना जाने लगा। अपोलो जीयूस और लोटो के पुत्र थे। तीसरी सदी ई.पू. के आसपास सूर्य रूप अपोलो का तादात्म्य यूनान के हेलियोस से किया जाने लगा। रोमन साम्राज्य के आधिकारिक देवता सूर्य सोल ही थे। रोमन संस्कृतियों में सूर्य की माता रूप में फ्रायर, नोर्स आिद देवियों का जिक्र आता है। नोर्स को प्रजनन की देवी के रूप में पूजा जाता है।

गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित सूर्यान्क नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या १९८ के अनुसार -

                                   आकाश के देवता "ऐना" और पृथ्वी के देवता "ईया" में निष्ठा रखने वाले बेबीलोनिया निवासियों ने  दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना। मिश्र की नीलघाटी सभ्यता में सूर्यपूजा मुख्य थी।  वहा मंदिरो को इस ढंग से बनाया जाता था कि उनके मध्य में स्थापित मूर्ति पर उदय लेते सूर्य कि किरणे पड़ सके।  
कैल्डियन लोग भी सूर्य को महत्त्व देते थे और उन्होंने ही सात ग्रहों का पता लगाया था जिनके नामो पर दिनों के नाम रखे थे।  वे तारो कि अवस्थिति और गति से भी अवगत थे। 
फिनीशियन सूर्य चंद्र के उपासक थे। असीरिया वाले भी सूर्य पूजा करते थे। सूर्य पूजा सर्वत्र थी। 
ऋग्वेद में सूर्य महिमा के सूचक १४ सूक्त है।  सौर समप्रदाय अत्यंत प्राचीन है भारतीय दैनंदिन में भी सूर्य पूजा अनिवार्य है। 

अकबर ने भी आदेश निकाला था,प्रातः,दोपहर शाम व अर्धरात्रि में सूर्य कि पूजा होनी चाहिए।  वह स्वयं सूर्य के अभिमुख होकर सूर्य के सहस्त्र नाम का पाठ अवं पूजा करता था।  इसके पश्चात चक्रवार घूमता था और अन्य विधियों से पूजा करता था। अकबर के द्वारा सम्मान्नित सौर सम्वत को राजकीय आय व्यय की गणना के लिए प्रचलित रखा था। (आईने अकबरी ब्लाख मैन का अंग्रेजी अनु ० १९६५ पृष्ठ संख्या २०९ से २१२ )

सूर्य उपासक की रात में भी मृत्यु होने पर अर्चि आदि मार्ग मिलता है परन्तु जो सकाम कर्मो में लगा हुआ है,उसकी दिन में मृत्यु हो तो भी वह दिन उसे मोक्ष पड़ की प्राप्ति कराने वाला नहीं होता। (हरिवंश पुराण भविस्य  पर्व अध्याय संख्या २८ , श्लोक १९ व २० से )

भगवान्  सूर्य के रुस्ट होने पर कुष्ट रोग (कोढ़) होने का प्रमाण :-(गीताप्रेस के सूर्यान्क नामक पुस्तक के पृष्ठ २४४ से २४६ )


                                                             ऋग्वेद के प्रथम मंडल में उल्लेख मिलता है कि सूर्य को सभी चर्म रोगों तथा अनेक भीषण रोगों का विनाशक बताया गया है। पारसियों में भी प्राचीन काल से मान्यता है कि कुष्ट रोग सूर्य के प्रति अपराध करना है (पारसी विद्वान् हेरोडोरस के अनुसार )
आज मिथिला में भी ऐसी धारणा है कि कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी के दिन सूर्योपासना करने से मनुस्य को किसी भी प्रकार का चर्मरोग नहीं हो सकता है।   
स्वास्तिक हिन्दू मात्र का एक सौर चिन्ह है जिसका अर्थ है भलीभांति रहना।
                                                        

                                                                                             सादर धन्यवाद /आभार  -
                                                                                                               पं० श्याम सुन्दर पांडेय                                                                                                                                                                की विवेचना के आधार पर यह लेख प्रस्तुत हुआ।

          आगे यदि और अधिक जानकारी प्राप्त होती है तो इस लेख  में अद्यतन होता रहेगा।